दीमक एक हानिकारक और खतरनाक कीट है
मनुष्य जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताओं में से आवास का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। मनुष्य जीवन भर मेहनत-मशक्कत करने के उपरान्त एक छोटे से घरौंदे का निर्माण करता है। यह घर उसकी प्रतिष्ठा, उसका सम्मान होता है। सर्दी-गर्मी, धूप-छाँव, सुख-दुख, हर मौसम, हर स्थिति में यह घर उसको एक छत एक आसरा देता है, उसका सहारा बनता है। नए घर में ऐसी ही नई आशा और विश्वास के साथ वह अपना गृह निवेश करता है। किन्तु यह घर मात्र मनुष्य का ही नहीं अपितु अन्य कई जीव-जन्तुओं का ठिकाना बन जाता है। घरों में कॉकरोच, मच्छर, छिपकली जैसे न जाने कितने ही जीव अपने ठोर-ठिकाने बना लेते हैं और साथ लाते हैं बिमारीया और कई परेशानियाँ।
ये जीव तो फिर भी अक्सर हमारी नजरों के सामने घूमते-फिरते दिखाई देते रहते हैं, किन्तु कुछ जीव तो ऐसे भी होते हैं जिनके पनपने के बाद भी हमें पता ही नहीं चलता कि ये हमारे घरोें में मौजूद भी हैं। ऐसा ही एक जीव है-दीमक।
क्या है दीमक
दीमक छोटे-छोटे कीट हैं जो घरों के पुराने दरवाजों, खिड़कियों या दीवारों के कोनों में देखने को मिलती है और लकड़ी और लकड़ी की बनी चीजें जैसे फर्नीचर दरवजो खिड़कियों आदि को कुतरकर खा जाते हैं। इन दीमकों का घर में होना बहुत ही नुकसानदेह होता है। वैसे तो दीमकों का प्रकोप हर मौसम में देखने को मिल ही जाता है परन्तु बरसात में यह सबसे अधिक तेजी से फैलती है। खिड़की, दरवाजों और लकड़ी के सामानों के साथ-साथ ये कागज में भी बहुत जल्द फैलती है। जिस वस्तु में एक बार दीमक लग जाये वह शीघ्र ही पूर्ण रूप से समाप्त हो जाती है।
वैज्ञानिक तोर पर
देखने में भले ही दीमक चींटी की भाँति होती है, परन्तु इनका चीटियों से भिन्न और उसकी अपेक्षा कम विकसित माना जाता है। दीमक इंसेक्टा आइसॉप्टेरा (insecta isoptera) वर्ग-गण के सदस्य हैं, इंसेक्टा-कीड़े और आइसॉप्टेरा बराबर पंख वाला, अर्थात दीमक ऐसे कीड़े हैं जिनके आगे और पीछे के पंख लगभग समान अाकार के होते हैं। अध्ययन के अनुसार अब तक 1,500 से भी अधिक दीमकों की जातियों का पता लगाया जा चुका है। भारत में ही 220 विभिन्न प्रजातियों की दीमक पाई जाती है।
दीमकों का निवास
माना जाता है कि दीमक पिछले 20-30 लाख वर्षों से पृथ्वी पर हैं और इनका उल्लेख अनेक पुराणों और महाकथाओं में भी पाया गया है।
अध्ययन के अनुसार, दीमक गरम तथा शीतोष्ण क्षेत्रों में ही पनपती है। यह समूहों में बस्तियाँ बनाकर रहती है,
जिन्हें टरमिटेरियम (termitarium) मिट्टी का टिला कहते हैं। जिनका निर्माण मिट्टी, पानी और दीमकों की लार से होता है।
दीमक हल्की गीली मिट्टी में अपनी लार मिलाकर अपनी बस्ती का निर्माण करते हैं। इनकी लार में मौजूद द्रव्य धूप में सूखकर कड़ा और मजबूत हो जाता है। इस प्रकार दीमक मिट्टी के अन्दर या आस-पास तथा नमी वाले स्थान पर पाये जाते हैं। अपनी प्रजाति, क्षेत्र और स्थान के अनुसार दीमकों की बस्तियों के भिन्न-भिन्न आकार होते हैं। एक मिट्टी का टिला साधारण 2 से 10 फुट तक की ऊँचाई का हो सकता है। यहाँ तक की 20-20 फीट ऊँचे दीमकों की बस्तियों को भी देखा गया है।
दीमकों की सामाजिक प्रणाली
एक ही मिट्टी के टिले में रहने वाली दीमक के भी अनेक आकार और प्रकार होते हैं। इन बस्तियों में रहते दीमकों का आकार एक छोटी-सी चींटी से लेकर बड़े चींटों के बराबर तक होता है। यह बस्तियाँ भी साधारण नहीं होती, दीमक के घर अर्थात बस्तियों में बहुत ही संगठित सामाजिक प्रणाली होती है। इन बस्तियों को सुचारू रखने हेतु दीमकों के समूहों में श्रमिक, सिपाही और सेवक सब होते हैं। एक ही मिट्टी के टिले में रहते प्रत्येक दीमक का अपना एक कार्य होता है। प्रत्येक बस्ती में एक रानी तथा एक राजा होते हैं जो पंखवार और बस्ती के निर्माता होते हैं। इसके बाद कुछ दीमक जनक होते हैं और कुछ जनक दीमक पंखदार होते हैं, ये जाति को आगे बढ़ाते है और नई बस्तियों का निर्माण करते हैं। श्रेणी की दीमकों में कुछ दीमक श्रमिक होते हैं, जो अपनी-अपनी श्रेणियों के अनुसार भोजन एकत्रण, रानी की देखभाल, बस्ती की सफाई और पालन-पोषण का कार्य करते हैं और कुछ सिपाही होते हैं, जो अपनी प्रजाति के अनुसार अपने बड़े जबड़े अथवा अपनी सूँडें से नाशक द्रव्य की पिचकारी द्वारा शत्रु से बस्ती की रक्षा करते हैं।
दीमकों का भोजन
दीमकों का मुख्य भोजन मृत लकड़ी या लकड़ी के उत्पादों में मौजूद सेल्यूलोस होता है। इसी कारण दीमक मनुष्य द्वारा उपयुक्त लकड़ी और चमड़े की वस्तुओं के सबसे बड़े शत्रु हैं। ये कुर्सी, मेज, दरवाजे, खिड़की आदि से लेकर दरी, कम्बल, कालीन तथा किताबें आदि सभी को खा जाते हैं। दीमक किसी भी वस्तु को बाहर से खाना नहीं शुरू करती। यह वस्तुओं में किसी एक किनारे से चुपचाप घुस जाती है और फिर अन्दर-ही-अन्दर उसे खाकर खोखला कर देती है। यही कारण है कि हमें दीमकों द्वारा किया गया नुकसान वस्तु के पूर्ण रूप से नष्ट होने के बाद ही दिखाई देता है।
कैसे आती है घर में दीमक
दीमक घरों में कई प्रकार से घुस सकती है जिनमें से सबसे मुख्य प्रकार है घरों में लकड़ी और मिट्टी का सीधा सम्पर्क इस प्रकार का दीमक सक्रमण उन घरों में देखने को मिलता है जिसमें लकड़ी के फर्श, पोर्च में लकड़ी की सीढ़ियाँ, मिट्टी को छूते लड़की के बने खिड़की के फ्रेम आदि का निर्माण होता है। इसी प्रकार यदि घरों की दीवारों में किसी प्रकार की दरार या जगह होती है तो दीमक उसकी सहायता से भी घर में प्रवेश कर सकती है।
दीमक दीवारों और नींव आदि में लगे जोड़ों और धातु के पदार्थों जैसे पाइप आदि के द्वारा भी घरों में प्रवेश कर लेती है।
कैसे पता चलेगा दीमकों का?
दीमक अंधेरे, आर्द्र और संरक्षित वातावरण में रहती है जिस कारण उन्हें खोजना बहुत कठिन हो जाता है। यही कारण है कि दीमकों द्वारा गम्भीर क्षति होने तक हमें उनके घरों में होने का पता नहीं चलता। साथ ही, चूँकि दीमक लकड़ी को अन्दर से खाते हुए अपना रास्ता बनाते हैं, इसलिये भी इनका पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। परन्तु कुछ ऐसे सामान्य से संकेत हैं जिनकी जाँचकर हम अपने घर या व्यावसायिक परिसर के आस-पास दीमक के होने का अनुमान लगा सकते हैं।
दीमक की बांबी
दीमक की बांबी फोटो मे देखिए
दीमकों के घरों में होने का सबसे सामान्य संकेत है घरों की दीवार पर मिट्टी की लाईन लेयर का पाया जाना। दीमक मिट्टी, गन्दगी और मलबे से बने आश्रय लाईन का निर्माण करती है। ये भूरे रंग की मिट्टी की लाईन अक्सर बाहरी दीवारोें से घरों के अन्दर अथवा लकड़ी के स्रोत तक पहुँचती हुई दिखाई देती हैं। दीमकों के होने का दूसरा बड़ा संकते है घर में दीमक के पंखों का पाया जाना। आमतौर पर सबसे पहले घरों में पंखों वाले दीमकों का आगमन होता है। ये दीमक प्राय ही खिड़की और फर्श पर अपने पंखों के अवशेष छोड़ जाते हैं जो घरों में दीमक के होने का संकेत देते हैं। लकड़ी को बजाने पर यदि खोखली अथवा कागजी सी आवाज उत्पन्न होती है तो यह भी घरों में दीमक के होने का संकेत है। आमतौर पर दीमक बाहरी लकड़ी अथवा पेंट की एक पतली परत को छोड़कर लकड़ी को अन्दर से पूरी तरह से खा जाते हैं। इस कारण ऐसी लकड़ी पर खटका करने से खोखली अथवा कागजी सी आवाज उत्पन्न होती है जो घर में दीमक के होने का संकेत देती है।
यदि इस प्रकार का कोई भी संकेत घरों में मिलता है तो वहाँ तुरन्त ही दीमक उपचार एवं नियंत्रण करने की आवश्यकता है।
दीमक नियंत्रण के कुछ
घरेलू उपचार
घरों से दीमक को समाप्त करने के लिये पुराने समय से ही कुछ घरेलू उपाय और उपचार अपनाए जाते हैं जो काफी हद तक दीमकों को नियंत्रण में रखते हैं।
1. ऐसे में सबसे अधिक उपयोग किये जाने वाला उपचार है-धूप यदि घर के किसी भी लकड़ी के फर्नीचर में दीमक लग जाये तो उसे तुरन्त ही बाकी लकड़ी के सामान से दूर कर, घर से बाहर निकाल कर धूप में रख देना चाहिए। ऐसे प्रतिदिन दीमक के समाप्त हो जाने तक उसे लगातार धूप में रखना चाहिए। एक सप्ताह में वह लकड़ी दीमक से पूर्ण रूप से मुक्त हो जाएँगी।
2. माना जाता है कि दीमक कड़वी महक से दूर भागते हैं इसीलिये जिस जगह पर दीमक लगी हुई हो वहाँ यदि करेले या नीम का रस छिड़क दिया जाये तो वातावरण में कड़वी महक से सभी दीमक धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। ऐसा सप्ताह भर करने से उस स्थान पर आमतौर पर फिर से दीमक नहीं लगती।
3. दीमक के बिल पर नमक का छिड़काव करने से भी वह मर जाती है।
4. घर में सही वातानुकूलन, हवा की आवाजाही और नमी के नियंत्रण द्वारा भी दीमक को पनपने से रोका जा सकता है क्योंकि इन्हें पनपने के लिये नमी की आवश्यकता होती है।
दीमक नियंत्रण व उपचार के ये घरेलू उपाय बहुत बचत वाले तो होते है परन्तु ये दीमक के विरुद्ध कोई पुख्ता इलाज नहीं है।
दीमकरोधी उपचार से पूर्व सावधानियाँ
भवनों में दीमकरोधी उपचार से पूर्व कुछ आवश्यक बातों का ध्यान रखना चाहिए-
1. भवनों में दीमकरोधी उपचार किसी कुशल तथा अनुज्ञप्ति प्राप्त दीमक नियंत्रण विशेषज्ञ से ही करवाना चाहिए।
2. बरसात मे, या बरसात के ठीक पहले अथवा ठीक बाद दीमकरोधी उपचार करवाना चाहिए।
3. उच्च क्वालिटी तथा प्रमाणिक दीमकनाशक दवाओं का ही प्रयोग कराया जाना चाहिए।
4. दीमकनाशक दवाओं को पंजीकृत एवं वैध अनुज्ञप्ति धारक विक्रेता से ही खरीदना चाहिए।
5. बिना नामपत्र बैच संख्या, पंजीकरण संख्या व उत्पादन तिथि की, समाप्ति तिथि के बाद की, खुली, रिसती अथवा बिना सील वाली दीमक नाशकदवा नहीं होनी चाहिए।
6. दीमकनाशक दवाओं का भण्डारण नहीं करना चाहिए तथा अति आवश्यक स्थिति में उन्हें बच्चों और पशुओं की पहुँच से दूर, सीधी धूप और बारिश से बचाकर, दवाई की वास्तविक पैकिंग में ही रखना चाहिए और भण्डारण क्षेत्र पर चेतावनी संकेत प्रदर्शित करने चाहिए।
7. दीमकनाशक दवाओं के छिड़काव से पूर्व निर्देशों को सावधानीपूर्वक पढ़ना अनिवार्य है।
8. आवश्यकता के अनुसार ही दीमकनाशक का घोल तैयार करना चाहिए जिसे 24 घंटे के पश्चात प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
9. दीमकनाशक दवाओं के छिड़काव से पूर्व सदैव सुरक्षात्मक वस्रों अर्थात दस्ताने, माखस टोपी, आदि पहनना अनिवार्य है।
10. दीमकनाशक दवाओं के छिड़काव के दौरान नाक, आँख, कान और हाथों आदि अंगों के बचाव का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।
11. दीमकनाशक दवाओं को उचित मात्रा मे ही प्रयोग करना चाहिए। अधिक मात्रा स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।
12. दीमकनाशक दवाओं के छिड़काव के दौरान खाना-पीना या धूम्रपान आदि निषेध है।
13. दीमकनाशक दवाओं का छिड़काव हवा की दिशा में करना चाहिए।
14. दीमकनाशक दवाओं के छिड़काव के पश्चात उपयुक्त छिड़काव उपकरण तथा बाल्टियों आदि को डिटर्जेंट आदि से साफ किया जाना चाहिए तथा उपयुक्त बाल्टियों और कंटेनरों को साफ करने के बाद भी घरेलू प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।
15. दीमकनाशक दवाओं के छिड़काव के तुरन्त बाद, छिड़काव किये गए स्थान पर पशुओं का तथा बिना सुरक्षात्मक कपड़ों के मनुष्यों का प्रवेश निषेध है।
16. बचे हुए दीमकनाशक दवा के घोल को नाली या पास के तालाब में बहाना निषेध है।
17. दीमकनाशक दवाओं के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव के जहर के लक्षण सामने आने पर प्राथमिक उपचार करके, तुरन्त चिकित्सक को दिखाना अनिवार्य है। सही उपचार एवं जाँच हेतु चिकित्सक को दीमकनाशक दवा का खाली कंटेनर भी दिखाना चाहिए।
दीमक हमारे आवासीय भवनों के लिये एक बहुत बड़ा खतरा है। ये छोटे-छोटे कीट बड़ी-से-बड़ी इमारत को स्वाहा करने में सक्षम हैं अतः इन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए। इन विनाशक-जीवों के उचित प्रबन्धन के बिना एक सुन्दर घर का सपना अधूरा ही रहेगा। भवन निर्माण से पूर्व और उसके पश्चात भी नियमित रूप से दीमकों की जाँच करते रहना चाहिए। दीमकनाशक दवाओं का बार-बार अथवा अनुचित प्रयोग करने से दीमक प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित कर सकते हैं जिससे और अधिक घातक दवाओं के मिश्रण का प्रयोग करना पड़ सकता है। अतः दीमक संक्रमण के पता चलने पर विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार तुरन्त ही दीमक उपचार कराकर भविष्य में अधिक खर्चे और खतरे तथा वातावरण तथा जीवधारियों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव दोनों से बचा जा सकता है।
अब आवश्यकता है कि भवनों में हानिरहित तथा पर्यावरण सुरक्षित दीमक प्रबन्धन की ओर समुचित प्रयास किये जाएँ जिससे किसी भी स्थिति में भवनों में इन दीमकनाशक दवाओं की मात्रा अनुमत सीमा से अधिक न हो। हमारा घर हमें सुरक्षा प्रदान करता है तो हमारा भी फर्ज है कि हम अपने घर को कीटों से सुरक्षित करें।
भवन निर्माण हेतु प्रायः उच्च गुणवत्ता और दाम वाली लकड़ी जैसे- देवदार, साल, शीशम, सागौन आदि का उपयोग किया जाता है तथा दीमक संक्रमण के कारण जल्द ही लकड़ी को बदलवाना काफी महंगा पड़ता है। इस कारण भवनों में दीमक नियंत्रण करना अति आवश्यक हो गया है और क्योंकि दीमक स्वाभाविक रूप से छिप कर लकड़ी नष्ट करता है अतः भवन में थोड़ा सा भी संक्रमण दिखाई देने पर शीघ्र ही उसका उपचार किया जाना चाहिए।
भवनों में दीमक नियंत्रण हेतु विश्व भर में विभिन्न प्रकार की दीमकनाशक दवाएँ,उपलब्ध हैं। भारत में भी विषैले कीटनाशकों पर आधारित बहुत सी दीमकनाशक दवाएँ मौजूद हैं
दीमक उपचार हेतु देश भर में अनेक विकल्प मौजूद हैं तथा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में भी दीमक नियंत्रण कार्य को सम्मिलित किया गया है। समय-मसय पर दीमक नियंत्रण पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्यशालाओं का आयोजन करता रहता है जिनमें दीमक प्रबन्ध, दीमकनाशक दवाओं का उचित प्रयोग, अपेक्षित सावधानियाँ, नए-नए उत्पादों आदि से सम्बन्धित जानकारी दी जाती है।
दीमकनाशक दवाओं का स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
भारत में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए की दीमकनाशक दवाओं का प्रयोग होता है। परन्तु इन दवाइयों का बहता प्रयोग भी स्वास्थ्य के लिये संकट सिद्ध हो रहा है। अक्सर लोग इन दवाइयों को खरीद कर बिना पूरी जानकारी या सावधानी के स्वयं ही अपने घर पर दीमक का उपचार करने लगते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
जहाँ दीमक और अन्य कीट अस्थमा, कंजक्टिवाइटिस, न्यूमोनिया, डायरिया, सेटीसीमिया, पैरालिसिस, चिकिनगुनिया, डेंगू, मलेरिया, पीलिया, टायफाइड, कॉलरा, रेबीज तथा खतरनाक वायरस जैसे- स्वाइन फ्लू, इबोला, जीका वायरस आदि जैसी हानिकारक बीमारियाँ फैलाते हैं, वहीं उचित सावधानी के बिना प्रयोग की जाने वाली दीमकनाशक दवाओं के सीधे और लम्बे समय तक सम्पर्क में आने से कैंसर, अस्थमा, अंधापन, पार्किंसन आदि अनेक प्रकार की घातक बीमारियाँ होने का खतरा रहता है। सर्वेक्षण के अनुसार अनुचित रूप से दीमकनाशक दवाओं का प्रयोग करने के कारण दुनिया में 25 लाख लोग प्रतिवर्ष बीमार होते हैं, जिनमें से लगभग 5 लाख लोग असमय मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।
टर्माइट बैट सिस्टम
टर्माइट बैट सिस्टम (फोटो साभार - अमेजन)
चिन्ता और गम्भीरता का विषय यह है कि कई बार इन दीमकनाशक दवाओं के अनुचित प्रयोग का स्वास्थ्य पर पड़ता नकारात्मक प्रभाव तुरन्त सामने नहीं आता है अथवा तुरन्त कोई बड़ी बीमारी का रूप नहीं लेता है।परन्तु तुरन्त नजर में आते लक्षणों जैसे- सिर दर्द, चक्कर आना, उल्टी होना, आँखें लाल हो जाना, लगातार आँखों से पानी बहना, धुँधला दिखाई देना, त्वचा में जलन, त्वचा लाल होना तथा चकत्ते पड़ना, भूख न लगना, स्वभाव में चिड़चिड़ापन, साँस लेने में परेशानी, दम घुटना आदि को हम दवाई के प्रभाव से नहीं जोड़ पाते हैं और सामान्य बीमारी समझकर इन्हें गम्भीरता से नहीं लेते हैं, जिससे ये जान के लिये भी खतरा उत्पन्न कर सकते हैं।
भारतीय बाजार में दीमकनाशक दवाएँ आसानी से उपलब्ध हैं, जिस कारण लोग इसके प्रयोग को हानिकारक नहीं समझते हैं। घरों के साथ-साथ खेती में भी लोग बिना उचित सावधानी के इन दवाओं का प्रयोग करते हैं। धूप तथा हवा आदि से फसलों पर इन दवाइयों का दुष्प्रभाव कम तो हो जाता है परन्तु मिट्टी पर यह असर वर्षों तक बना रह सकता है। मिट्टी से ये दवाइयाँ बहकर नदी तथा तालाबों में जाकर जल, जलीय शाक तथा मछलियों आदि को प्रदूषित करती हैं। इस तरह इन प्रदूषित कृषि उत्पाद, जल, जलीय शाक एवं जीव और प्रभावित चारे के कारण दूध आदि द्वारा इन दवाइयों के अवशेष मानव शरीर में प्रवेश करते हैं और अनेक बीमारियों को जन्म देते हैं।
दीमकनाशक दवाओं के प्रयोग द्वारा भवनों में दीमकों के प्रकोप से तुरन्त फायदा तो अवश्य मिलता है किन्तु इन दवाओं का उपयोग विशेष दीमक नियंत्रण विशेषज्ञों द्वारा अथवा उनके निर्देशन में ही किया जाना चाहिए ताकि इनका प्रयोग संक्रमण के अनुसार नियंत्रित मात्रा और उचित सावधानियों के साथ किया जा सके।
Unique Universal Pest Control Services
युनिक यूनिवर्सल कीट नियंत्रण सेवाएँ
संस्थापक" जे पी पान्डेय
प्रबंधक " रोहन वर्मा
सहायक प्रबंधक" राहुल तिवारी
शक्ति विहार रेलवे स्टेशन रूरकी
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Aap ka kaam bohot hi sahrniye hai
ReplyDeleteGood work